हज का बहिष्कार क्यों कर रहे हैं दुनिया भर के मुस्लिम?

लीबिया के सबसे विख्यात सुन्नी मौलवी ग्रैंड मुफ्ती सादिक अल-घरीआनी ने सभी मुस्लिमों से इस्लाम में अनिवार्य माने जाने वाली हज पवित्र यात्रा का बहिष्कार करने की अपील की. उन्होंने यह भी दावा किया कि अगर कोई भी शख्स दूसरी बार हज यात्रा करता है तो यह नेकी का काम नहीं बल्कि पाप होगा..... 

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  • सऊदी के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान पिछले कुछ समय से अपनी आक्रामक घरेलू और विदेशी नीतियों पर पर्दा डालने के लिए कथित उदारवादी सुधारों को लाकर सऊदी शासन की एक अलग छवि गढ़ने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन इसके बावजूद वह अपने खिलाफ उठ रही आवाजों को दबा नहीं पा रहे हैं.

     
    हज का बहिष्कार क्यों कर रहे हैं दुनिया भर के मुस्लिम?
     

    यमन में सऊदी बमों से मरने वाले नागरिकों की बढ़ती संख्या, इस्तांबुल के सऊदी दूतावास में पत्रकार जमाल खशोगी की खौफनाक हत्या और रियाद के ईरान को लेकर आक्रामक रवैये की वजह से सऊदी के सुन्नी सहयोगी भी क्राउन प्रिंस को समर्थन देने के अपने फैसले पर दोबारा विचार करने को मजबूर हो गए हैं.

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    फॉरेन पॉलिसी की रिपोर्ट के मुताबिक, अप्रैल महीने में लीबिया के सबसे विख्यात सुन्नी मौलवी ग्रैंड मुफ्ती सादिक अल-घरीआनी ने सभी मुस्लिमों से इस्लाम में अनिवार्य माने जाने वाली हज पवित्र यात्रा का बहिष्कार करने की अपील की. उन्होंने यह भी दावा किया कि अगर कोई भी शख्स दूसरी बार हज यात्रा करता है तो यह नेकी का काम नहीं बल्कि पाप होगा. 

     
    हज का बहिष्कार क्यों कर रहे हैं दुनिया भर के मुस्लिम?
     

    इस बहिष्कार की अपील के पीछे तर्क ये है कि मक्का में हज के जरिए सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था मजबूत हो रही है. मजबूत अर्थव्यवस्था के जरिए सऊदी की हथियारों की खरीद जारी है जिससे यमन और अप्रत्यक्ष तौर पर सीरिया, लीबिया, ट्यूनीशिया, सूडान और अल्जीरिया में हमलों को अंजाम दिया जा रहा है. मौलवी सादिक ने आगे कहा कि हज में निवेश करना, मुस्लिम साथियों के खिलाफ हिंसा करने में सऊदी की मदद करना होगा.

     
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    सादिक पहले विख्यात मुस्लिम स्कॉलर नहीं हैं जो हज के बहिष्कार की अपील कर रहे हैं. सुन्नी मौलवी और सऊदी अरब के प्रखर आलोचक युसूफ अल-काराडावी ने अगस्त महीने में फतवा जारी किया था जिसमें हज की मनाही की गई थी. इस फतवे में कहा गया था कि भूखे को खाना खिलाना, बीमार का इलाज करवाना और बेघर को शरण देना अल्लाह की नजर में हज पर पैसा बहाने से ज्यादा अच्छा काम है.
     
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    सऊदी अरब का प्रभाव केवल राजनीतिक और सैन्य तौर पर ही नहीं है बल्कि इस्लाम के साथ इसका ऐतिहासिक रिश्ता भी काफी अहमियत रखता है. इस्लाम के दो सबसे प्रमुख धार्मिक स्थल मक्का और मदीना दोनों सऊदी अरब में ही हैं और यहीं काबा और पैगंबर मोहम्मद की मजार भी है. यही वजह है कि सऊदी अरब का प्रभाव केवल अरब पड़ोसियों ही नहीं बल्कि पूरी मुस्लिम दुनिया पर है. हर साल करीब 23 लाख मुस्लिम हज के लिए मक्का जाते हैं. इस्लाम के साथ इस रिश्ते की वजह से सुन्नी अरब दुनिया नियमित तौर पर सऊदी शासन से मार्गदर्शन लेती रही है. 


    ईरान की 1979 की इस्लामिक क्रान्ति और पूरे क्षेत्र में इसके फैल जाने के डर से सऊदी अरब ने खुद को इस्लाम के ब्रैंड के तौर पर पेश करने के लिए दुनिया भर में मस्जिदों की फंडिंग में लाखों डॉलर्स खर्च किए. सऊदी अरब खुद को मुस्लिम दुनिया के नेता के रूप में पेश करता रहा है.

  • हज का बहिष्कार क्यों कर रहे हैं दुनिया भर के मुस्लिम?
     

    कई सालों से सऊदी अरब मध्य-पूर्व में क्षेत्रीय अधिनायक बनने की तरफ कदम आगे बढ़ा रहा है जिसे एकमात्र चुनौती ईरान से मिल रही है. दुनिया के सबसे बड़े तेल निर्यातक देशों में से एक और यूएस का करीबी होने की वजह से सऊदी अरब को दशकों से अपने पड़ोसी देशों का समर्थन आसानी से हासिल होता रहा है.

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    खशोगी की हत्या में शाही परिवार की संलिप्तता के पर्याप्त सबूत होने के बावजूद ट्रंप प्रशासन सऊदी की किसी भी तरह की भूमिका होने से इनकार करता रहा है. यूएस ने भले ही आंखें मूंद ली हों लेकिन मुस्लिम जगत सऊदी को माफ करने के मूड में नजर नहीं आ रहा है.

    हज का बहिष्कार क्यों कर रहे हैं दुनिया भर के मुस्लिम?

    मध्य-पूर्व और कई मुस्लिम बहुल देशों में खशोगी की हत्या को लेकर सबके मन में आक्रोश पनपा है. यमन में सऊदी नीत गठबंधन द्वारा हवाई हमले में मरने वालों की बढ़ती संख्या भी मुस्लिमों को चिंतित कर रही है. यमन में हॉस्पिटल और बच्चों की स्कूल बसों को भी निशाना बनाया गया. यहां तक कि संयुक्त राष्ट्र ने यमन युद्ध को मानवजनित सबसे खतरनाक संकट बताया.
     
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    सऊदी अरब के यमन युद्ध को लेकर रवैये ने उसे अपने ही सहयोगियों से दूर कर दिया है, यहां तक कि अमीराती सरकार भी सऊदी के रुख से असहज हुई है. सऊदी अरब के इसी रुख की वजह से कई देश उसे हथियारों की बिक्री पर रोक लगाने की मांग कर रहे हैं. यूएस हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव और सीनेट ने हाल ही में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सऊदी के साथ हथियार समझौते का विरोध किया. जर्मनी ने भी पिछले साल अक्टूबर महीने से ही सऊदी के साथ ऐसे समझौतों पर प्रतिबंध लगाया हुआ है. इसी क्रम में, स्विटजरलैंड और इटली भी सऊदी किंगडम के साथ हथियारों की बिक्री पर रोक लगाने की तरफ कदम आगे बढ़ा रहे हैं. हाल ही में एक ब्रिटिश कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि सऊदी अरब के साथ हथियारों के समझौते गैर-कानूनी हो सकते हैं. इस्लामिक स्कॉलर सादिक ने एक कदम आगे बढ़ते हुए कहा कि सऊदी का बहिष्कार करने के लिए हज ना करने जाएं.
     
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    शिया-सुन्नी से ऊपर उठा विरोध
    पिछले कुछ दशकों के उलट इस बार सऊदी अरब का बहिष्कार पंथों के मतभेद से भी ऊपर उठ चुका है. 2011 में  रियाद ने बहरीन के अनुरोध पर विद्रोहों का बुरी तरह दमन कर दिया था. सुन्नी शासन वाले बहरीन में शिया मुस्लिमों ने प्रदर्शनों में हिस्सा लिया था. इराकी कार्यकर्ताओं ने सऊदी उत्पादों का बहिष्कार करने की अपील कर इस पर प्रतिक्रिया दी थी. उस वक्त इराक के तत्कालीन प्रधानमंत्री नूरी अल-मालिकी ने कहा था कि अगर सऊदी नीत हिंसा जारी रहती है तो मध्य-पूर्व में पंथों के बीच युद्ध छिड़ सकता है.

     
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    वर्तमान में सऊदी साम्राज्य के बहिष्कार की अपीलें केवल शिया समुदाय से नहीं आ रही हैं बल्कि हर समुदाय इस पर एकजुट हो रहा है. ट्विटर पर कम से कम 16,000 ट्वीट्स के साथ #boycotthajj ट्रेंड कर रहा है. दुनिया भर के सुन्नी मौलवी भी हज के बहिष्कार की अपील कर रहे हैं. ट्यूनीशियन यूनियन ऑफ इमाम ने जून महीने में कहा था कि हज से सऊदी प्रशासन को मिलने वाले पैसे का इस्तेमाल दुनिया भर के मुस्लिमों की मदद करने में नहीं किया जाता है बल्कि यमन की तरह मुस्लिमों की हत्या और उन्हें विस्थापित करने में किया जा रहा है.  
     
    हज का बहिष्कार क्यों कर रहे हैं दुनिया भर के मुस्लिम?
     

    इस्लाम के पांच स्तंभों में से हज को एक प्रमुख स्तंभ माना गया है और यह मुस्लिमों के लिए अनिवार्य कर्तव्य भी है लेकिन बहिष्कार की ये मांग इशारा करती है कि सऊदी के प्रति चिंताएं कितनी वास्तविक हैं. अगर यह ट्रेंड जारी रहता है तो यह सऊदी अरब के लिए न सिर्फ इस्लाम के लिहाज से बल्कि उसकी अर्थव्यवस्था के लिए भी बड़ी चुनौती बन सकता है.

     
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    सऊदी की अर्थव्यवस्था में हज तीर्थयात्रा की बहुत बड़ी भूमिका है और इससे करीब 12 अरब डॉलर की आय होती है. हज से होने वाली कमाई तेल के अलावा सऊदी की आय का सबसे प्रमुख स्रोत है. सऊदी की सरकार द्वारा लग्जरी होटलों पर निवेश को देखते हुए 2022 तक तक इस कमाई के 150 अरब डॉलर पहुंचने की उम्मीद है. इस निवेश से सऊदी को काफी मुनाफा हो रहा है लेकिन बढ़ते खर्च की वजह से कई गरीब मुस्लिमों के लिए हज यात्रा मुश्किल हो गई है.
     
     
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    यह पहली बार नहीं है जब किसी धार्मिक तीर्थयात्रा का राजनीतिकरण किया गया है. सऊदी अरब ने पिछले कुछ वर्षों में कतर और ईरान के नागरिकों को हज तीर्थयात्रा की अनुमति देने से इनकार कर दिया था. सऊदी अधिकारियों ने मक्का की पवित्रता का इस्तेमाल अपनी राजनीतिक विचारधारा का प्रचार करने में भी किया.

    पिछले साल अक्टूबर महीने में एक उपदेश के दौरान मक्का की मुख्य मस्जिद के इमाम शेख अब्दुल-रहमान अल-सुदैस ने कहा था, इस पवित्र भूमि में सुधार और आधुनिकता से पूर्ण रास्ते पर...युवा, महत्वाकांक्षी और दैवीय ताकतों से प्रेरित सुधारक क्राउन प्रिंस की देखभाल में हम तमाम दबावों और धमकियों के बीच आगे बढ़ रहे हैं. इस संदेश का यही संकेत था कि किसी भी मुस्लिम को सऊदी राजनीतिक परिवार पर सवाल नहीं खड़े करने चाहिए.

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    कम होता रुतबा
    खशोगी की हत्या और यमन युद्ध में अपनी भूमिका से ध्यान हटाने के लिए सऊदी अरब ने मई महीने में मक्का में आपातकालीन शिखर वार्ता बुलाई ताकि ईरान पर वापस ध्यान केंद्रित किया जा सके. शिखर वार्ता के दौरान अरब नेताओं, जीसीसी (गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल, इस्लामिक दुनिया) से सऊदी ने अपील की है कि हर तरह से ईरान को अपने आतंरिक मामलों में हस्तक्षेप करने से रोकना होगा.

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    सऊदी अरब के क्षेत्र में कम होते रुबते का एक सबूत तब मिला जब इराक ने ईरान की निंदा वाले बयान का खुले तौर पर विरोध किया था. यही नहीं, इराक ने ईरान के प्रति समर्थन का संदेश दिया और दूसरे देशों से भी ईरान को स्थिर बनाने की अपील की. मक्का में शिखर वार्ता के दौरान, इराक के राष्ट्रपति बरहम साली ने ईरान के संदर्भ में कहा, ईमानदारी से बात की जाए तो पड़ोसी देश की स्थिरता मुस्लिम और अरब राज्यों के हित में है. शिखर वार्ता के दौरान ही सऊदी अरब इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC) से भी ईरान को अलग-थलग कराने में नाकामयाब रहा. 


    यमन में मौतों के बढ़ते आंकड़ों के साथ पूरी दुनिया में सऊदी अरब के आर्थिक, धार्मिक और राजनीतिक बहिष्कार की अपील तेज हो गई है और यह केवल हथियारों की बिक्री तक सीमित नहीं है. रियाद को पश्चिम में भी दोस्तों की कमी पड़ गई है और अब इसके क्षेत्रीय सहयोगियों के बीच भी दरार पड़ती नजर आ रही है. अगर ट्रंप प्रशासन को दूसरा कार्यकाल नहीं मिलता है तो सऊदी अरब के कुछ ही अंतरराष्ट्रीय दोस्त बचे रह जाएंगे और उसके मुस्लिम व अरब दुनिया का नेता होने के दावे को बुरी तरह से नुकसान पहुंचेग

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21 July 2019